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एंतोनियो गुटेरेश (यूएन महासचिव) मानवाधिकार व कोविड-19 से निपटने के उपाय व बेहतरी
23 Apr 2020 -  कोविड-19 महामारी एक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपदा है – मगर, दरअसल उससे भी कहीं ज़्यादा. ये एक आर्थिक संकट है. एक सामाजिक संकट है. और एक ऐसा मानवीय संकट जो तेज़ी से मानवाधिकारों का संकट बन रहा है.
मैंने फ़रवरी में, मानवीय प्रतिष्ठा और मानवाधिकारों के सार्वभौमिक घोषणा-पत्र में किए गए वायदों को अपने सभी कामकाज के केंद्र में रखने के लिए क़दम उठाने का आहवान किया था. जैसा, मैंने उस समय कहा था, संकट के दौर में मानवाधिकार एक किनारे नहीं रखे जा सकते – और इस समय हम पीढियों का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय संकट देख रहे हैं.
मैं, आज एक रिपोर्ट जारी कर रहा हूँ जिसमें दिखाया गया है कि मानवाधिकार किस तरह से कोविड-19 का मुक़ाबला करने के उपायों को रास्ता दिखा सकते हैं और दिखाना ही होगा. संदेश स्पष्ट है: आमजन – और उनके अधिकार – सर्वोपरि और अहम हों.
मानवाधिकारों के चश्मे से सभी दिखें और किसी को भी पीछे ना छोड़ा जाए.
मानवाधिकारों पर आधारित उपाय महामारी को हराने में मदद कर सकते हैं, जिससे सभी के लिए स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता की अनिवार्यता पर ध्यान केंद्रित हो.
लेकिन उनसे एक आवश्यक चेतावनी प्रणाली के रूप में – ये भी नज़र आता है कि कौन सबसे ज़्यादा तकलीफ़ में हैं, क्यों, और इस बारे में क्या किया जा सकता है.
हम देख रहे हैं कि वायरस इंसानों में कोई भेद नहीं करता, लेकिन उसका असर करता है – सार्वजनिक सेवाओं में गहरी कमज़ोरियों और ढाँचागत असमानताओं के कारण बहुत से लोग वंचित रह जाते हैं.
हमें सभी उपायों में इन मुद्दों का समुचित ध्यान रखना होगा.
हम कुछ समुदायों पर ग़ैर-आनुपातिक प्रभाव देख रहे हैं, नफ़रत भरी भाषा का प्रसार बढ़ा है, कमज़ोर समूहों को निशाना बनाया जा रहा है, और सुरक्षा सख़्तियों के कारण स्वास्थ्य उपाय कमज़ोर हो रहे हैं.
कुछ देशों में नस्लीय राष्ट्रवाद, लोकलुभावनवाद, निरंकुशता के उभार, और मानवाधिकारों को नैपथ्य में ढकेलने की पृष्ठभूमि... इस संकट के बहाने ऐसे दमनकारी तरीक़े भी लागू करने का बहाना बन सकती है जिनका इस महामारी से कोई संबंध ना हो.
ये बिल्कुल अस्वीकार्य है.
पहले से भी कहीं ज़्यादा, सरकारों को पारदर्शी, दायित्वपूर्ण व जवाबदेह होना होगा. नागरिक स्थान और प्रेस की आज़ादी बहुत अहम है. सिविल सोसायटी संगठनों और निजी क्षेत्र की भी बहुत अहम भूमिका है.
और हम जो कुछ भी करें, हम ये ना भूलें: ख़तरा वायरस है, लोग नहीं.
ये सुनिश्चित करना होगा कि तमाम आपदा उपाय क़ानूनी, आनुपातिक, आवश्यक और ग़ैर-भेदभावपूर्ण, लक्ष्य आधारित और निर्धारित अवधि के लिए हों. और सार्वजनिक स्वास्थ्य की संरक्षा के लिए यथासंभव न्यूनतम हस्तक्षेपकारी हों.
सर्वश्रेष्ठ उपाय वो हैं जो तात्कालिक जोखिम का मुक़ाबला करने पर ध्यान दें और मानवाधिकार व क़ानून के शासन की रक्षा करें.
भविष्य पर नज़र टिकाएँ तो, हमें ज़्यादा बेहतर हालात बनाने होंगे. मानवाधिकारों में पैबन्द टिकाऊ विकास लक्ष्य – ज़्यादा समावेशी और टिकाऊ अर्थव्यवस्थाएँ व समाजों के निर्माण का ढाँचा मुहैया कराते हैं.
आर्थिक व सामाजिक अधिकारों की मज़बूती से दीर्घकालीन मज़बूती का मार्ग प्रशस्त होता है. उबरने के उपायों में भविष्य की पीढ़ियों के अधिकारों का भी सम्मान हो, जिनमें 2050 तक कार्बन शून्यता और जैव विविधता के संरक्षण के लिए जलवायु कार्रवाई पर ध्यान हो.
हम इसमें सब एक साथ हैं.
वायरस से सभी को ख़तरा है. मानवाधिकारों से सभी की बेहतरी होती है.
संकट के इस दौर में मानवाधिकारों का सम्मान करके, हम आज की आपदा और भविष्य की बेहतरी के लिए ज़्यादा असरदार और समावेशी समाधान निकालेंगे.
धन्यवाद.
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